उर्दू शायरी · ग़ज़ल

raqs mein sath jo sahra ko bhi Dhaale hue hain

रक़्स में साथ जो सहरा को भी ढाले हुए हैं

رقص میں ساتھ جو صحرا کو بھی ڈھالے ہوئے ہیں

शायर: Nadim Nadeem7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रक़्स में साथ जो सहरा को भी ढाले हुए हैं
ये किसी शहर-ए-तमन्ना के निकाले हुए हैं

रंग-ओ-रोग़न हैं तिरे जिस्म का ये गर्द-ओ-ग़ुबार
तेरी ज़ुल्फ़ें हैं बदन पर जो ये जाले हुए हैं

आह को साज़ बनाते हैं दुखों की रुत में
दिल-शिकस्ता हैं पर आवाज़ सँभाले हुए हैं

देखिए और हमें देख के हैरत कीजे
वो हिरन हैं कि जो बरसात में काले हुए हैं

कौन सी आग में जलता है ये अंदर अंदर
बहते दरिया के बदन पर जो ये छाले हुए हैं

मैं ने ख़ुद अपनी तबाही के मज़े लूटे हैं
और हैरान मिरे चाहने वाले हुए हैं

क़ैद हो पाना ख़यालों का कहाँ मुमकिन है
वैसे ज़ंजीर तो हम पाँव में डाले हुए हैं