उर्दू शायरी · ग़ज़ल

rabt ko tark karun aur sanbhaalun KHud ko

रब्त को तर्क करूँ और सँभालूँ ख़ुद को

ربط کو ترک کروں اور سنبھالوں خود کو

शायर: Vikram Sharma6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रब्त को तर्क करूँ और सँभालूँ ख़ुद को
नाव गर बच नहीं सकती तो बचा लूँ ख़ुद को

अब तिरे बा'द मिरा अपने सिवा कोई नहीं
जी में आता है कि सीने से लगा लूँ ख़ुद को

रात अगर और भी हो सर्द तिरा ज़िक्र करूँ
लकड़ियाँ ख़त्म जो हो जाएँ जला लूँ ख़ुद को

हर नए 'इश्क़ में पहले से तमाशे देखूँ
इस पे मुश्किल है कि हैरत में भी डालूँ ख़ुद को

मेरी आँखों की नमी धूप तिरे चेहरे की
वक़्त-ए-रुख़्सत मैं धनक जैसे सजा लूँ ख़ुद को

वक़्त के साथ मैं ग़र्क़ाब हुआ जाता हूँ
तू अगर साथ दे माज़ी से निकालूँ ख़ुद को