उर्दू शायरी · ग़ज़ल

raat ka sannaTa ho aur raaz-dan koi na ho

रात का सन्नाटा हो और राज़-दाँ कोई न हो

رات کا سناٹا ہو اور رازداں کوئی نہ ہو

शायर: T N Raaz9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

रात का सन्नाटा हो और राज़-दाँ कोई न हो
बीवियाँ तन्हा ही घूमें और मियाँ कोई न हो

मम्लिकत को फ़िक्र-ए-तामीर-ए-मकाँ कोई न हो
हों पड़े फ़ुटपाथ पे सब आशियाँ कोई न हो

है यही जी में कि हम सब ख़ाना-जंगी में मरें
मुल्क पे मिटने की ख़ातिर ख़ानदाँ कोई न हो

आपा-धापी की फ़ज़ा हो जो भी चाहे लूट ले
राहबर ना-बीना हों सब पासबाँ कोई न हो

आँख से देखा न जाए 'अक़्ल पर पर्दा पड़े
वो किसी से भी मिलें मुझ को गुमाँ कोई न हो

जब हुई इक लड़की इग़वा शैख़ ने दी बद-दु'आ
इस गली का लौंडा या-रब अब जवाँ कोई न हो

चाक़ू छुरियाँ हाल में लाने के हम क़ाइल नहीं
है यही काफ़ी कि बस अब इम्तिहाँ कोई न हो

रिश्वतों का ख़त्म हो पाए न कोई सिलसिला
सी बी आई ढूँढती हो पर निशाँ कोई न हो

बक गया है 'राज़' क्या क्या दोस्तों के दरमियाँ
बे-हया मुँह-फट और ऐसा बद-ज़बाँ कोई न हो