उर्दू शायरी · ग़ज़ल

main use dekhun bhala kab mujhse dekha jae hai

मैं उसे देखूँ भला कब मुझ से देखा जाए है

میں اسے دیکھوں بھلا کب مجھ سے دیکھا جائے ہے

शायर: T N Raaz11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मैं उसे देखूँ भला कब मुझ से देखा जाए है
हुस्न की लाइट से मेरी आँख चुँधिया जाए है

जब से ब्यूटी पार्लर से हो के आया वो हसीं
साँप की मानिंद उस की ज़ुल्फ़ बल खा जाए है

आदमी की जब नज़र में क़द्र खो दे आदमी
बकरे के बदले में उस का सर भी झटका जाए है

वो जो आ जाएँ मिरी मय्यत पे रोने के लिए
ख़ुद-बख़ुद मेरा कफ़न चेहरे से सरका जाए है

मीट खाने का उन्हें पिकनिक में भी चस्का है क्या
कार के बॉनेट पे बैठा साथ मुर्ग़ा जाए है

रंग खुल जाए हैं उन के गाल पर होली के दिन
पेंट काला भी अगर हो रुख़ पे खुलता जाए है

है नगर में आदमी का डंगरों का सा चलन
हर सड़क के खम्बे से वो पीठ खुजला जाए है

किस भरोसे लीडरी का दम भरूँ मैं आज-कल
ख़ास चमचा था जो मेरा वो भी कतरा जाए है

तेज़ साँसें चल रही हों हुस्न की गर्मी से जब
अच्छे अच्छे 'आशिक़ों का दम भी घुटता जाए है

थान पर ख़च्चर के मैं ने ऊँट बाँधा था जो कल
रंग उस पर वो चढ़ा कि हिनहिनाता जाए है

ये सलीक़ा ख़ूब देखा 'राज़' ने कल बज़्म में
जो न पीता हो उसी पर जाम डाला जाए है