उर्दू शायरी · ग़ज़ल

rah-rau ko dur se manzil samajh baiThe the hum

राह-रौ को दूर से मंज़िल समझ बैठे थे हम

راہرو کو دور سے منزل سمجھ بیٹھے تھے ہم

शायर: Balbir Rathi4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

राह-रौ को दूर से मंज़िल समझ बैठे थे हम
बहर-ए-ग़म में मौज को साहिल समझ बैठे थे हम

अब तो हर पेचीदगी अपनी समझ में आ गई
वर्ना हर आसान को मुश्किल समझ बैठे थे हम

इस में रहबर की नहीं थी बल्कि अपनी भूल थी
या'नी इक नादान को 'आक़िल समझ बैठे थे हम

हर नई ख़्वाहिश को समझे थे मुक़द्दस तिश्नगी
हर धड़कती चीज़ को क्यों दिल समझ बैठे थे हम