उर्दू शायरी · ग़ज़ल

rah mein paDti thi diwar nahin dekh saka

राह में पड़ती थी दीवार नहीं देख सका

راہ میں پڑتی تھی دیوار نہیں دیکھ سکا

शायर: Danish Naqwi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

राह में पड़ती थी दीवार नहीं देख सका
मैं कि इस पार था उस पार नहीं देख सका

देखता था जिसे रोज़ाना की बुनियाद पे मैं
एक दो साल से इक बार नहीं देख सका

यार तू कैसे किसी शख़्स की जाँ लेता है
मैं तो इक चिड़िया को बीमार नहीं देख सका

इस पे क्या ग़म कि चुराई हैं निगाहें उस ने
मैं भी तो उस को लगातार नहीं देख सका

तू ऐ दुश्मन मिरी हालत को कहाँ देखेगा
मेरी जानिब तो मिरा यार नहीं देख सका

इस लिए उम्र से मैं तुझ को बड़ा लगता हूँ
तू मेरे हिज्र की रफ़्तार नहीं देख सका

ऐसी तरतीब से रक्खा था सजा कर 'दानिश'
माल में नक़्स ख़रीदार नहीं देख सका