उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mahaul munasib ho to upar nahin jate

माहौल मुनासिब हो तो ऊपर नहीं जाते

ماحول مناسب ہو تو اوپر نہیں جاتے

शायर: Danish Naqwi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

माहौल मुनासिब हो तो ऊपर नहीं जाते
हम ताज़ा घुटन छोड़ के छत पर नहीं जाते

देखो मुझे अब मेरी जगह से न हिलाना
फिर तुम मुझे तरतीब से रख कर नहीं जाते

बदनाम हैं सदियों से ही काँटों की वजह से
आदत से मगर आज भी कीकर नहीं जाते

जिस दिन से शिकारी ने अदा की कोई मन्नत
दरबार पे उस दिन से कबूतर नहीं जाते

सो तुम मुझे हैरत-ज़दा आँखों से न देखो
कुछ लोग सँभल जाते हैं सब मर नहीं जाते