उर्दू शायरी · ग़ज़ल

patthar se visal mangti hun

पत्थर से विसाल माँगती हूँ

پتھر سے وصال مانگتی ہوں

शायर: Fahmida Riaz6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

पत्थर से विसाल माँगती हूँ
मैं आदमियों से कट गई हूँ

शायद पाऊँ सुराग़-ए-उल्फ़त
मुट्ठी में ख़ाक-भर रही हूँ

हर लम्स है जब तपिश से आरी
किसी आँच से यूँ पिघल रही हूँ

वो ख़्वाहिश-ए-बोसा भी नहीं अब
हैरत से होंट काटती हूँ

इक तिफ़्लक-ए-जुस्तुजू हूँ शायद
मैं अपने बदन से खेलती हूँ

अब तब्अ' किसी पे क्यूँ हो राग़िब
इंसानों को बरत चुकी हूँ