उर्दू शायरी · ग़ज़ल

muddat se ye aalam hai dil ka hansta bhi nahin rota bhi nahin

मुद्दत से ये आलम है दिल का हँसता भी नहीं रोता भी नहीं

مدت سے یہ عالم ہے دل کا ہنستا بھی نہیں روتا بھی نہیں

शायर: Fahmida Riaz5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुद्दत से ये आलम है दिल का हँसता भी नहीं रोता भी नहीं
माज़ी भी कभी दिल में न चुभा आइंदा का सोचा भी नहीं

वो मेरे होंट पे लिक्खा है जो हर्फ़ मुकम्मल हो न सका
वो मेरी आँख में बस्ता है जो ख़्वाब कभी देखा भी नहीं

चलते चलते कुछ थम जाना फिर बोझल क़दमों से चलना
ये कैसी कसक सी बाक़ी है जब पाँव में वो काँटा भी नहीं

धुँदलाई हुई शामों में कोई परछाईं सी फिरती रहती है
मैं आहट सुनती हूँ जिस की वो वहम नहीं साया भी नहीं

तज़ईन-ए-लब-ओ-गेसू कैसी पिंदार का शीशा टूट गया
थी जिस के लिए सब आराइश उस ने तो हमें देखा भी नहीं