उर्दू शायरी · ग़ज़ल

pahle si walihana tabiat nahin teri

पहले सी वालिहाना तबी'अत नहीं तिरी

پہلے سی والہانہ طبیعت نہیں تری

शायर: Vaibhav Kumar5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

पहले सी वालिहाना तबी'अत नहीं तिरी
क्या ज़िंदगी से कोई शिकायत नहीं तिरी

सुलतान हो गया है ज़माने का तू मगर
इस दिल की सल्तनत पे हुकूमत नहीं तिरी

बद-क़िस्मती तो अपनी मिरे यार देख ले
उस को मिला है तू जिसे चाहत नहीं तिरी

इतने बड़े जहान में ऐ मेरे हम-सफ़र
मेरे सिवा किसी को भी 'आदत नहीं तिरी

फिर 'उम्र भर को आँसुओं का सिलसिला चला
उस ने जो कह दिया कि ज़रूरत नहीं तिरी