उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kabhi tumhaara mera samna nahin hota

कभी तुम्हारा मिरा सामना नहीं होता

کبھی تمہارا مرا سامنا نہیں ہوتا

शायर: Vaibhav Kumar5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कभी तुम्हारा मिरा सामना नहीं होता
वगरना शहर में हर रोज़ क्या नहीं होता

बदन से रूह का टाँका उधड़ रहा है मगर
वो एक शख़्स ही मुझ से जुदा नहीं होता

तमाम लोग तरसते हैं रौशनी के लिए
मगर नसीब में सब के दिया नहीं होता

कई के हाथ जलाने में भी जले होंगे
हर एक आग बुझा कर जला नहीं होता

फ़क़ीर पीर वली साधू संत सा इंसान
'अज़ीम होता है लेकिन ख़ुदा नहीं होता