उर्दू शायरी · ग़ज़ल

nok-e-qalam ko jurat-e-izhaar de gaya

नोक-ए-क़लम को जुरअत-ए-इज़हार दे गया

نوک قلم کو جرأت اظہار دے گیا

शायर: Zafar Naseemi4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

नोक-ए-क़लम को जुरअत-ए-इज़हार दे गया
ये कौन मेरे हाथ में तलवार दे गया

दोहरा रही है आज भी तारीख़ वाक़िआ'त
या फिर कोई पढ़ा हुआ अख़बार दे गया

मैं जाँ निसार कर के फ़ज़ीलत-मआ'ब हूँ
वो सर उतार कर मुझे दस्तार दे गया

ये आबले ये ज़ख़्म सब उस के ही फ़ैज़ हैं
माँगे बग़ैर दिरहम-ओ-दीनार दे गया