उर्दू शायरी · ग़ज़ल

nit-nae zulm jhelta hun main

नित-नए ज़ुल्म झेलता हूँ मैं

نت نئے ظلم جھیلتا ہوں میں

शायर: Yasir Raza Asif9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

नित-नए ज़ुल्म झेलता हूँ मैं
जुर्म ये है कि सोचता हूँ मैं

मुझ को सहरा-नशीन रहने दो
आने वालों का रास्ता हूँ मैं

आइना रख के सामने अक्सर
तेरी आँखों में झाँकता हूँ मैं

मुझ को मज्ज़ूब सब समझते हैं
ख़ुद को थोड़ा सा जानता हूँ मैं

तुझ से मिलने की क्या करूँ कोशिश
अब तो ख़ुद से भी भागता हूँ मैं

पहले चुप से तुम्हें शिकायत थी
अब ये कहते हो बोलता हूँ मैं

इस तरह कौन तुझ को देखेगा
जिस तरह तुझ को देखता हूँ मैं

मेरे लहजे के दर्द को समझो
तुझ को जाने से रोकता हूँ मैं

अब तो 'आसिफ़' गए ज़मानों से
अपने बारे में पूछता हूँ मैं