उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bujha bujha sa hai manzar koi charagh nahin

बुझा बुझा सा है मंज़र कोई चराग़ नहीं

بجھا بجھا سا ہے منظر کوئی چراغ نہیں

शायर: Yasir Raza Asif7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बुझा बुझा सा है मंज़र कोई चराग़ नहीं
ख़याल-ओ-ख़्वाब का मज़हर कोई चराग़ नहीं

किसी मज़ार पे जलता हो या सर-ए-महफ़िल
मिरी नज़र में तो कमतर कोई चराग़ नहीं

बसा है दिल में जो वलियों सा ख़ुशनुमा चेहरा
उसी से दिल है मुनव्वर कोई चराग़ नहीं

नशिस्त-ए-ज़न है वो रस्ते में तीरगी की सिपाह
मिरी कुमक में मयस्सर कोई चराग़ नहीं

तुम्हारी आँख से बढ़ कर कोई भी जाम नहीं
तुम्हारे साथ से बढ़ कर कोई चराग़ नहीं

सितारे ओढ़ के सोया है वो परी-पैकर
मिरे जहाँ के फ़लक पर कोई चराग़ नहीं

बताऊँ राज़ की बातें मैं तुम को क्या 'आसिफ़'
दरूद-ए-पाक से बेहतर कोई चराग़ नहीं