उर्दू शायरी · ग़ज़ल

nazar na aae to kya wo mere qayas mein hai

नज़र न आए तो क्या वो मिरे क़यास में है

نظر نہ آئے تو کیا وہ مرے قیاس میں ہے

शायर: Ummeed Fazli6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

नज़र न आए तो क्या वो मिरे क़यास में है
वो एक झूट जो सच्चाई के लिबास में है

अमल से मेरे ख़यालों का मुँह चिढ़ाता है
वो एक शख़्स कि पिन्हाँ मिरे लिबास में है

अभी जराहत-ए-सर ही इलाज ठहरा है
कि नब्ज़-ए-संग किसी दस्त-ए-बे-क़यास में है

शजर से साया जुदा है तो धूप सूरज से
सफ़र हयात का किस दश्त-ए-बे-क़यास में है

ज़रा जो तल्ख़ हो लहजा तो कोई बात बने
ग़रीब-ए-शहर मगर क़ैद-ए-इल्तिमास में है

तुझे ख़बर भी है ख़ुद तेरी कम-निगाही का
इक ए'तिराफ़ तिरे हर्फ़-ए-ना-सिपास में है