उर्दू शायरी · ग़ज़ल

nazar jhuka ke kuen mein wo jhank le na kahin

नज़र झुका के कुएँ में वो झाँक ले न कहीं

نظر جھکا کے کنویں میں وہ جھانک لے نہ کہیں

शायर: Saba Ikram5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

नज़र झुका के कुएँ में वो झाँक ले न कहीं
ख़ुद अपने 'अक्स पे पागल है मर-मिटे न कहीं

जिसे सहारा दिए तुम खड़े हो आँधी में
तुम्हारे सर पे ही दीवार वो गिरे न कहीं

हर एक लम्हा था डर पीछे छूट जाने का
जो निकले वक़्त के हमराह तो रुके न कहीं

जो शब के साए में महफ़िल जमाए बैठे थे
जब आई शब तो वही शहर में मिले न कहीं

ख़ुलूस-ओ-मेहर-ओ-वफ़ा का नगर मैं देख आया
'सबा' वो दोस्त पुराने मुझे मिले न कहीं