उर्दू शायरी · ग़ज़ल

nasib wasl tumhaara kaho to kyun-kar ho

नसीब वस्ल तुम्हारा कहो तो क्यूँ-कर हो

نصیب وصل تمہارا کہو تو کیوں کر ہو

शायर: Bahadur Shah Zafar10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

नसीब वस्ल तुम्हारा कहो तो क्यूँ-कर हो
फ़िराक़-ए-यार में तस्कीन हो तो क्यूँ-कर हो

तू अपने वा'दे का सच्चा जो हो तो क्यूँ-कर हो
ये तुझ से झूट की हो तर्क ख़ू तो क्यूँ-कर हो

न जल के ख़ाक हो जब तक कि मिस्ल-ए-परवाना
हो तैश दिल का हमारे फ़रो तो क्यूँ-कर हो

तिरे मरीज़ के गुर सौ 'इलाज हों लेकिन
शिफ़ा न उस के नसीबों में हो तो क्यूँ-कर हो

किसी पे राज़-ए-निहाँ दिल का तेरे ऐ आँखो
जो तुम न गिर्या से अफ़्शा करो तो क्यूँ-कर हो

ये हम भी चाहते हैं तर्क-ए-'इश्क़ हो लेकिन
जो दिल पे बस न हो ऐ नासेहो तो क्यूँ-कर हो

मिलें न ख़ाक में जब तक तुम्हारे कुश्ता-ए-नाज़
दमीदा ख़ाक से हो नाज़-ए-बू तो क्यूँ-कर हो

जिगर पे ज़ख़्म तो खाए मगर मज़ा हासिल
नमक-फ़िशाँ हो न वो जंग-जू तो क्यूँ-कर हो

करम कहाँ के सितम भी हो करते नाज़ से तुम
जो ये भी हो तो ग़नीमत है वो तो क्यूँ-कर हो

'ज़फ़र' जो हो न मोहब्बत में दिल से दिल को राह
वो मेरे हाल से आगाह हो तो क्यूँ-कर हो