उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dekh dil ko mere o kafir-e-be-pir na toD

देख दिल को मिरे ओ काफ़िर-ए-बे-पीर न तोड़

دیکھ دل کو مرے او کافر بے پیر نہ توڑ

शायर: Bahadur Shah Zafar7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

देख दिल को मिरे ओ काफ़िर-ए-बे-पीर न तोड़
घर है अल्लाह का ये इस की तो ता'मीर न तोड़

ग़ुल सदा वादी-ए-वहशत में रखूँगा बरपा
ऐ जुनूँ देख मिरे पाँव की ज़ंजीर न तोड़

देख टुक ग़ौर से आईना-ए-दिल को मेरे
इस में आता है नज़र 'आलम-ए-तस्वीर न तोड़

ताज-ए-ज़र के लिए क्यूँ शम' का सर काटे है
रिश्ता-ए-उल्फ़त-ए-परवाना को गुल-गीर न तोड़

अपने बिस्मिल से ये कहता था दम-ए-नज़' वो शोख़
था जो कुछ 'अह्द सो ओ 'आशिक़-ए-दिल-गीर न तोड़

रक़्स-ए-बिस्मिल का तमाशा मुझे दिखला कोई दम
दस्त-ओ-पा मार के दम तू तह-ए-शमशीर न तोड़

सहम कर ऐ 'ज़फ़र' उस शोख़ कमाँ-दार से कह
खींच कर देख मिरे सीने से तू तीर न तोड़