उर्दू शायरी · ग़ज़ल

nashtari lafzon ka lahja marhami rakkha gaya

नश्तरी लफ़्ज़ों का लहजा मरहमी रक्खा गया

نشتری لفظوں کا لہجہ مرہمی رکھا گیا

शायर: Ekhlaq Ahmad Ekhlaq10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

नश्तरी लफ़्ज़ों का लहजा मरहमी रक्खा गया
ज़ख़्म पर मिर्ची से पहले थोड़ा घी रक्खा गया

'इश्क़ में जिस दम ख़मीर-ए-'आशिक़ी रक्खा गया
हुस्न के अंदर मिज़ाज-ए-बे-रुख़ी रक्खा गया

आदमी का इम्तिहाँ से जब गुज़रना तय हुआ
आदमी को रू-ब-रू-ए-ज़िंदगी रक्खा गया

नींद वालों को यहाँ रक्खा गया फ़ुट-पाथ पर
जागने वालों का बिस्तर मख़मली रक्खा गया

पीने वालों के बहकने से अगर परहेज़ था
बज़्म में फिर क्यों निज़ाम-ए-मय-कशी रक्खा गया

रखने वाला जानता था 'इश्क़ का ग़म इस लिए
लुत्फ़ के पहलू में दर्द-ए-‘आशिक़ी रक्खा गया

उन को महबूब-ए-ख़ुदा होने का हासिल है शरफ़
शुक्र है मुझ को उन्ही का उम्मती रक्खा गया

चूँकि रिश्ता आदमी का हज़रत-ए-आदम से है
इस लिए नाम आदमी का आदमी रक्खा गया

गर्दिश-ए-दौराँ की ताक़त का भी अंदाज़ा हुआ
जब मिरे ही घर का मुझ को अर्दली रक्खा गया

आज फिर 'अख़लाक़' वा'दा कर के वो आया नहीं
आज फिर मुझ को ख़ुशी से दूर ही रक्खा गया