उर्दू शायरी · ग़ज़ल

falak par jalta bujhta ek sitara tha wo main tha

फ़लक पर जलता बुझता इक सितारा था वो मैं था

فلک پر جلتا بجھتا اک ستارہ تھا وہ میں تھا

शायर: Ekhlaq Ahmad Ekhlaq8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

फ़लक पर जलता बुझता इक सितारा था वो मैं था
उमीद-ओ-यास का जो शख़्स मारा था वो मैं था

हमेशा जीत कर तुम से जो हारा था वो मैं था
वफ़ा का जिस के हिस्से में ख़सारा था वो मैं था

अना के शहर में जश्न-ए-बुलंदी था वो तुम थे
वहीं इक सम्त मातम का नज़ारा था वो मैं था

मुझे अब यूँ न देखो मैं अमानत हूँ किसी की
मोहब्बत के दिनों में जो तुम्हारा था वो मैं था

ख़ुशी में जो तिरे हमराह था वो था ज़माना
ग़मों के दौर में जिस का सहारा था वो मैं था

वो कोई और था तुम बढ़ रहे थे जिस की जानिब
वो जिस ने रो के पीछे से पुकारा था वो मैं था

चला था जब वो मेले में पकड़ कर हाथ मेरा
फ़ज़ा में सब से ऊँचा जो ग़ुबारा था वो मैं था

जवानी में बहारों पर तिरा क़ब्ज़ा था 'अख़लाक़'
मगर दिल पर तिरे जिस का इजारा था वो मैं था