उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kisi bhi haal mein milne ki farmaish nahin chhoDi

किसी भी हाल में मिलने की फ़रमाइश नहीं छोड़ी

کسی بھی حال میں ملنے کی فرمائش نہیں چھوڑی

शायर: Ekhlaq Ahmad Ekhlaq5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

किसी भी हाल में मिलने की फ़रमाइश नहीं छोड़ी
मिरे दिल ने तिरे दीदार की ख़्वाहिश नहीं छोड़ी

बिछड़ते वक़्त उस ने अपनी चाहत की क़सम दे कर
हमारी वापसी की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी

दम-ए-आख़िर न वो आए न आसानी से दम निकला
क़ज़ा के वक़्त भी तक़दीर ने गर्दिश नहीं छोड़ी

हमें अब ज़िंदगी कुछ दे न दे क्या फ़र्क़ पड़ता है
बुरे हालात ने दिल में कोई ख़्वाहिश नहीं छोड़ी

ख़ुशी ने तो हमारी सम्त देखा भी नहीं 'अख़लाक़'
मगर ग़म ने हमारे हाल की पुर्सिश नहीं छोड़ी