उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bana hai shahr mein jis ka makan shishe ka

बना है शहर में जिस का मकान शीशे का

بنا ہے شہر میں جس کا مکان شیشے کا

शायर: Ekhlaq Ahmad Ekhlaq8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बना है शहर में जिस का मकान शीशे का
वो चाहता है बने आसमान शीशे का

ये चंद हाथ ये पत्थर मिटा न पाएँगे
बहुत बड़ा है यहाँ ख़ानदान शीशे का

मैं तेज़ धूप से ख़ुद को बचाने पहुँचा था
नसीब देखो मिला साएबान शीशे का

हसीन चाँद से चेहरे को रू-ब-रू रख कर
वो आज तोड़ गया है गुमान शीशे का

मिरे क़बीले का सरदार जब हुआ अंधा
मिटा क़बीले से हर इक निशान शीशे का

करोड़ों लोगों के सर पर नहीं है छत लेकिन
बना रहा है वो हिन्दोस्तान शीशे का

हुज़ूर आप ने काग़ज़ के फूल रक्खे हैं
कहाँ से लाए महक फूल-दान शीशे का

सदाक़तों की शहादत के नाम पर 'अख़लाक़'
क़दम-क़दम पे हुआ इम्तिहान शीशे का