उर्दू शायरी · ग़ज़ल

nai zamin ata ho naya makan bhi bane

नई ज़मीन अता हो नया मकाँ भी बने

نئی زمین عطا ہو نیا مکاں بھی بنے

शायर: Faisal Imam Rizvi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

नई ज़मीन अता हो नया मकाँ भी बने
हमारे हिज्र का कुछ मुनफ़रिद निशाँ भी बने

चुभो लिया तिरी चूड़ी का शीशा आँखों में
हमारी आँख का नक़्शा लहूलुहाँ भी बने

तमाम हिज्र-ज़दा लोग मेरे साथ चलें
फ़िराक़-ए-यार के मारों का कारवाँ भी बने

कोई सिला नहीं पाया तुम्हारी चाहत में
तुम्हारे वास्ते लोगों में बद-ज़बाँ भी बने

बहार आई है फूलों से लद गईं शाख़ें
हमारे नाम का इक ग़ुंचा-ए-दहाँ भी बने

उगा रहा हूँ नए पेड़ घर के आँगन में
कोई तो हो जो मिरे घर का साएबाँ भी बने

हुनर न इल्म न अक़्ल-ओ-शुऊर था 'फ़ैसल'
कुछ ऐसे लोग यहाँ मीर-ए-कारवाँ भी बने