उर्दू शायरी · ग़ज़ल

na rah-rau hain ikaTTha na rah-dan paida

न राह-रौ हैं इकट्ठा न राह-दाँ पैदा

نہ راہ رو ہیں اکٹھا نہ راہ داں پیدا

शायर: Urooj Qadri7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

न राह-रौ हैं इकट्ठा न राह-दाँ पैदा
तो क्या ज़मीन से हो जाए कारवाँ पैदा

मशक़्क़तों से न घबरा न ज़हमतों से कभी
कि फूल होते हैं काँटों के दरमियाँ पैदा

वो ख़ल्क़-ओ-अम्र के मालिक हैं वो अगर चाहें
तो इक इशारे से होते हैं सौ जहाँ पैदा

ज़मीं को गर्दिश-ए-अफ़्लाक से नजात नहीं
“ब-हर ज़मीं कि रसीदेम आसमाँ पैदा”

तुम्हीं बहार हो मेरे लिए कि होता है
तुम्हारे आरिज़-ए-गुल-गूँ से गुल्सिताँ पैदा

बताओ कौन है जिस का जमाल-ए-जाँ-परवर
ब-हर-मकाँ है नुमूदार ओ हर-ज़माँ पैदा

'उरूज' तू न हो ग़मगीं हुजूम-ए-आ'दा से
इसी हुजूम से होते हैं मेहरबाँ पैदा