उर्दू शायरी · ग़ज़ल

na jaane kab badal jae muqaddar dekh lete hain

न जाने कब बदल जाए मुक़द्दर देख लेते हैं

نہ جانے کب بدل جائے مقدر دیکھ لیتے ہیں

शायर: Nafas Ambalvi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

न जाने कब बदल जाए मुक़द्दर देख लेते हैं
तुझे ऐ ज़िंदगी चल आज़मा कर देख लेते हैं

'अज़ाबों से गुज़र कर ये हुनर उतरा है आँखों में
कि हम क़तरे में भी पिन्हाँ समंदर देख लेते हैं

मिरे बच्चे खिलौनों के लिए भी ज़िद नहीं करते
कहाँ तक पाँव फैलाने हैं चादर देख लेते हैं

ज़मीं कम है हमारे ख़्वाब की वुस'अत ज़ियादा है
चलो फिर ख़्वाब का नक़्शा बदल कर देख लेते हैं

ये हम पर दोस्तों की मेहरबानी है कि अब हम भी
छुपे हैं आस्तीनों में जो ख़ंजर देख लेते हैं

ये लाज़िम तो नहीं मीनार से सब कुछ दिखाई दे
वहाँ से जो नहीं दिखता क़लंदर देख लेते हैं

अभी तक याद हैं इन को सितम ज़िल्ल-ए-इलाही के
इन्हें बे-जान मत कहना ये पत्थर देख लेते हैं

बहुत प्यासे हों ये फिर भी हर इक छत पर नहीं जाते
कहाँ बर्तन में पानी है कबूतर देख लेते हैं