उर्दू शायरी · ग़ज़ल

na jaane choT kyon dil par lagi hai

न जाने चोट क्यों दिल पर लगी है

نہ جانے چوٹ کیوں دل پر لگی ہے

शायर: Tabassum Nigam Dehlvi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

न जाने चोट क्यों दिल पर लगी है
कली गुलशन में जब कोई खिली है

तुम्हारा नाम ले कर हँस रही है
ये दुनिया अब यहाँ तक आ गई है

जला है इस तरह कुछ आशियाना
जहाँ तक देखता हूँ रौशनी है

मुझी से मेरी बर्बादी के क़िस्से
ये दुनिया हाए कितनी अजनबी है

न जाने और क्या क्या गुल खिलेंगे
बहार अब तो क़फ़स तक आ गई है

जिए जिस के लिए जाँ उस पे दे दी
ये ही बस दास्तान-ए-ज़िंदगी है

मुझे सब जानते पहचानते हैं
मगर तू है कि अब तक अजनबी है

तलातुम से गुज़र कर जाने वाले
किनारे पर भी कश्ती डूबती है

जिसे सब दुश्मन-ए-जाँ कह रहे हैं
'तबस्सुम' की उसी से दोस्ती है