उर्दू शायरी · ग़ज़ल

muzmar hai baqa hasti-e-alam ki fana mein

मुज़्मर है बक़ा हस्ती-ए-आलम की फ़ना में

مضمر ہے بقا ہستئ عالم کی فنا میں

शायर: Maharaja Sir Kishan Parashad Shad16 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुज़्मर है बक़ा हस्ती-ए-आलम की फ़ना में
इक जल्वा-ए-वहदत भी है कसरत की फ़ज़ा में

आवाज़-ए-अलस्त आप की मैं सुन तो चुका था
अपने को फँसाया है बला कह के बला में

नैरंगी-ए-अंदाज़-ए-नज़र देख रहा हूँ
डूबी हुई है शोख़-नज़र शर्म-ओ-हया में

दम तोड़ता इस तरह न बीमार-ए-मोहब्बत
शायद कि अजल भी थी शरीक उन की अदा में

देखा है जो वहशी का तिरे ख़ाक उड़ाना
चक्कर में बगूला है तो गर्दिश है हवा में

देखो मुझे देखा न करो नीची नज़र से
क्यों करते हो रुस्वा मुझे बज़्म-ए-रुफ़क़ा में

ये ख़त्म न होगी न कभी आएगा वो दिन
क्या फ़र्क़ शब-ए-हिज्र में और रोज़-ए-जज़ा में

लो फ़स्ल-ए-बहार आते ही वो हो गया इफ़्शा
जो राज़ कि ग़ुंचों का था पोशीदा सबा में

कौन आया था ऐ शैख़ गया कौन इधर से
सज्दों के निशाँ कैसे हैं नक़्श-ए-कफ़-ए-पा में

पूछो ये सिकंदर से कि शाही न थी काफ़ी
जो उम्र बसर की हवस-ए-आब-ए-बक़ा में

साक़ी ने जो ज़ाहिद को ज़रा आँख दिखाई
बे-ख़ुद हुए इक जाम-ए-मय-ए-होश-रुबा में

क्यों अहल-ए-फ़ना से ख़बर-ए-क़ाफ़िला पूछें
हम जानते हैं गुम वो हुआ राह-ए-बक़ा में

ला-इल्म हूँ क्या जानिए क्या इस में लिखा है
है नामा-ए-आमाल मिरा दस्त-ए-क़ज़ा में

डरता हूँ कहीं वो न झिजक जाए न डर जाए
पैदा हुई बिजली की चमक आह-ए-रसा में

ये कम है दराज़ी में न वो तूल में कुछ कम
निस्बत है शब-ए-हिज्र में और ज़ुल्फ़-ए-दोता में

क्यों बाँध नहीं लेते हो दिल 'शाद' का ले कर
तुक्मे की कमी है जो गरेबान-ए-क़बा में