उर्दू शायरी · ग़ज़ल

muntashir shahzad-gan-e-dil ka shiraaza na ho

मुंतशिर शहज़ाद-गान-ए-दिल का शीराज़ा न हो

منتشر شہزاد گان دل کا شیرازہ نہ ہو

शायर: Ghaus Mohammad Ghausi9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुंतशिर शहज़ाद-गान-ए-दिल का शीराज़ा न हो
काश यारों की हँसी फ़ित्नों का ग़म्माज़ा न हो

अब वो सोने का सही लेकिन मिरे किस काम का
जिस मकाँ में कोई खिड़की कोई दरवाज़ा न हो

वो जवाँ ख़ून और उस पर नश्शा-ए-दीदा-वरी
क्या करें वो भी जो मेरे ग़म का अंदाज़ा न हो

याद है कुछ तुम ने कल ख़ाका उड़ाया था मिरा
फूल सी आँखों में शबनम कल का ख़म्याज़ा न हो

फिर जुनूँ क्यूँ-कर सजे दुनिया को कैसे रंग दे
बाइ'स-ए-तहरीक अगर यारों का आवाज़ा न हो

काश मेरे ग़म का साया भी रहे अपनों से दूर
काश अब यकजा मिरी यादों का शीराज़ा न हो

आ गले मिलने से पहले क्यूँ न मिल कर देख लें
दिल के तह-ख़ाने में कोई चोर दरवाज़ा न हो

वो तो मुर्दा हैं उन्हें एहसास की ख़ुशबू से क्या
अपने अंदाज़-ए-नज़र का जिन को अंदाज़ा न हो

काश ऐ 'ग़ौसी' ज़माने भर का बचपन लौट आए
सब के चेहरों पर हक़ीक़ी नूर हो ग़ाज़ा न हो