उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mujhe hayat ke sanchon mein Dhaalne wale

मुझे हयात के साँचों में ढालने वाले

مجھے حیات کے سانچوں میں ڈھالنے والے

शायर: Ehtisham Akhtar6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मुझे हयात के साँचों में ढालने वाले
कहाँ गए वो समुंदर खंगालने वाले

लुढ़क रहा हूँ ढलानों से प्यार की मैं तो
न आएँ राह में मुझ को सँभालने वाले

हमारे शौक़-ए-फ़रावाँ ने डस लिया हम को
कि आस्तीं में थे हम साँप पालने वाले

हवा में फेंक न मुझ को समझ के खेल कोई
तुझी को आ के लगूँगा उछालने वाले

ज़रा सा काम हूँ मैं फिर भी ना-मुकम्मल हूँ
यहाँ मिले हैं सभी मुझ को टालने वाले

कुआँ हवस का था गहरा कुछ इस क़दर 'अख़्तर'
कि ख़ुद ही गिर गए मुझ को निकालने वाले