उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mohabbat mein hamesha bewafai mar deti hai

मोहब्बत में हमेशा बेवफ़ाई मार देती है

محبت میں ہمیشہ بے وفائی مار دیتی ہے

शायर: Yamit Punetha Zaif8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मोहब्बत में हमेशा बेवफ़ाई मार देती है
कि हम जैसे दिवानों को जुदाई मार देती है

क़फ़स की क़ैद में पाला गया है जिन परिंदों को
हमेशा उन परिंदों को रिहाई मार देती है

वहाँ फ़ौजी वतन के वास्ते क़ुर्बान होता है
यहाँ बेवा को भी सूनी कलाई मार देती है

शराफ़त का ज़माना अब नहीं है याद रखना तुम
हज़ार अच्छाइयाँ हों तो बुराई मार देती है

इसी इक ख़ौफ़ के रहते कभी बिगड़ा नहीं हूँ मैं
ग़लत करने को होता हूँ तो माई मार देती है

किसी से दोस्ती करना तो बे-शक सोच के करना
बुरे लोगों की अक्सर आश्नाई मार देती है

क़लम में ख़ून-ए-दिल भर कर ग़ज़ल कहने लगा हूँ मैं
कई अल्फ़ाज़ तो ये रौशनाई मार देती है

किसी मुफ़्लिस की हालत पर कभी ऐ 'ज़ैफ़' मत हँसना
ग़रीबों को हमेशा जग-हँसाई मार देती है