उर्दू शायरी · ग़ज़ल

guftar mein chhalka teri namkin baaton ka namak

गुफ़्तार में छलका तिरी नमकीन बातों का नमक

گفتار میں چھلکا تری نمکین باتوں کا نمک

शायर: Yamit Punetha Zaif5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

गुफ़्तार में छलका तिरी नमकीन बातों का नमक
तेरी इजाज़त हो तो चख लूँ तेरे होंठों का नमक

गर देखिए तो अब वहाँ गुलज़ार पैदा हो गए
जिस जा छिड़क आया था मैं पैरों के छालों का नमक

भूके रहे लेकिन किसी के आगे फैलाया न हाथ
हरगिज़ नहीं खाया कभी ग़ुर्बत में ग़ैरों का नमक

मुझ को रुलाने वाले तेरी हर ख़ुशी क़ाएम रहे
मेरी दु'आ है तू कभी चक्खे न अश्कों का नमक

पीता हूँ धो कर 'ज़ैफ़' तो इस में ग़लत क्या है बता
मुझ को तबर्रुक लगता है ये माँ के पैरों का नमक