उर्दू शायरी · ग़ज़ल

dard hi se faqat bani ho kya

दर्द ही से फ़क़त बनी हो क्या

درد ہی سے فقط بنی ہو کیا

शायर: Yamit Punetha Zaif8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दर्द ही से फ़क़त बनी हो क्या
ज़िंदगी इतनी ही बुरी हो क्या

तुम से इतना लगाव क्यों है मुझे
तुम मिरी रूह में बसी हो क्या

हाल-ए-दिल तो छुपा चुका था मैं
तुम मिरी आँखें पढ़ रही हो क्या

गाँव कब का उजड़ गया भाई
शहर से लौटे ही अभी हो क्या

चुभ रही हैं ये धड़कनें भी अब
दिल के टुकड़े ही कर गई हो क्या

दूसरे कितने मिल गए होंगे
अब उसे मेरी ही कमी हो क्या

हो गई है तो मान ले ग़लती
तेरी हर बात अब सही हो क्या

अश्क काग़ज़ भिगो रहे हैं क्यों
'ज़ैफ़' की नज़्म पढ़ रही हो क्या