उर्दू शायरी · ग़ज़ल

misl-e-mahtab khule jab wo ikahra chehra

मिस्ल-ए-महताब खुले जब वो इकहरा चेहरा

مثل مہتاب کھلے جب وہ اکہرا چہرہ

शायर: Nadim Nadeem5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मिस्ल-ए-महताब खुले जब वो इकहरा चेहरा
देखने वालों का हो जाए सुनहरा चेहरा

जिस्म की खींचूँ लकीरें तो धुआँ उठता है
उस का काग़ज़ पे बना पाता हूँ चेहरा चेहरा

नीली आँखों से दबे हल्क़े गुलाबी रुख़्सार
उस का क्या ज़िक्र करें यार वो ठहरा चेहरा

अहल-ए-दानिश की सफ़ों में कोई हम सा भी न था
कौन पढ़ पाता भला उस का वो गहरा चेहरा

ऐ मिरे दोस्त मिरे साथ तिरी यादों की
रेत इतनी है हुआ जाता है सहरा चेहरा