उर्दू शायरी · ग़ज़ल

meri ghazal se ghazal ki mahfil sajaane wala koi na hoga

मिरी ग़ज़ल से ग़ज़ल की महफ़िल सजाने वाला कोई न होगा

مری غزل سے غزل کی محفل سجانے والا کوئی نہ ہو گا

शायर: Jabbar Wasif18 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मिरी ग़ज़ल से ग़ज़ल की महफ़िल सजाने वाला कोई न होगा
ये बात तय है कि मेरी बरसी मनाने वाला कोई न होगा

वरक़ वरक़ आँसुओं का बिस्तर बिछाने वाला कोई न होगा
ग़मों को ग़ज़लों के पालने में सुलाने वाला कोई न होगा

मैं दिल-बुरीदा सा एक शा'इर हूँ मेरा दिल बंद हो गया तो
क़सम क़लम की दुखों का मातम मनाने वाला कोई न होगा

कभी जो मुझ सा हक़ीक़तों का पयाम्बर उठ गया जहाँ से
ग़ज़ल के पर्दे पे सच के मंज़र दिखाने वाला कोई न होगा

जो इस सदी में मिरी ग़ज़ल को मिली न तौक़ीर 'मीर' जैसी
तो अगली सदियों में ग़ज़लें-वज़लें सुनाने वाला कोई न होगा

मैं रूठ जाऊँगा बज़्म-ए-हस्ती की रौनक़ों से तो देख लेना
गले से अपने लगा के मुझ को मनाने वाला कोई न होगा

सफ़ेद चादर को ओढ़ कर एक रात सो जाऊँगा मैं ऐसे
कि सुब्ह-दम इस जहाँ में मुझ को जगाने वाला कोई न होगा

मैं मिस्ल-ए-बू-ज़र अकेला इक दश्त-ए-बे-कसी में मरूँगा और फिर
चहार-जानिब मिरा जनाज़ा उठाने वाला कोई न होगा

मुझे यक़ीं है मैं बा'द मरने के करगसों का शिकम भरूँगा
ज़मीं की गोदी में मेरा लाशा छुपाने वाला कोई न होगा

मैं जानता हूँ ब-जुज़ ख़ुदा इस जहाँ में मेरा कोई नहीं है
मैं जानता हूँ कि मेरी तुर्बत बनाने वाला कोई न होगा

तमाम रिश्ते तमाम नाते मैं ज़िंदगी में ही खो चुका हूँ
सो मेरी मय्यत पे चार आँसू बहाने वाला कोई न होगा

ख़ुदा ने जन्नत के आठ दर्जे किए हैं तख़्लीक़ पर ये सच है
किसी में भी ख़िल्क़त-ए-ख़ुदा को सताने वाला कोई न होगा

तुम्ही बताओ कहाँ से लाओगे अपने मतबख़ में माँ सी बरकत
जब आयतें पढ़ के घर में चूल्हा जलाने वाला कोई न होगा

वो ऐसा बद-बख़्त हुक्मराँ है जिसे मुहाफ़िज़ ये कह रहे हैं
हमें बचाओ वगरना तुम को बचाने वाला कोई न होगा

ये पानियों के वबाल वीरान कर के रख देंगे साहिलों को
उदास दरिया में कश्तियों को चलाने वाला कोई न होगा

जो बरखा-रुत ने इसी तरह से बहा दिया सारी बस्तियों को
तो प्यासी धरती पे मेघ-मल्हार गाने वाला कोई न होगा

ख़ुदा-ए-बर्तर मिरे किसानों को ग़र्क़ होने से तू बचा ले
वगरना इक दिन सुनहरी गंदुम उगाने वाला कोई न होगा

समय बहुत है क़रीब 'वासिफ़' मैं ऐसे इक देस जा रहा हूँ
जहाँ पे अपना-पराया मुझ को रुलाने वाला कोई न होगा