उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mere hi dil ko apna ghar samajhna

मिरे ही दिल को अपना घर समझना

مرے ہی دل کو اپنا گھر سمجھنا

शायर: Ibrat Bahraichi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मिरे ही दिल को अपना घर समझना
उसे तुम ताज से बेहतर समझना

न करना ख़ैर-ख़्वाही तुम किसी की
जो बेहतर हो उसे बेहतर समझना

न इतराना कभी शोहरत पे अपनी
सदा अपने को तुम अहक़र समझना

उड़ा दे आदमी को जो बमों से
उसे चंगेज़ का लश्कर समझना

है धोका देना अपने आप को बस
किसी इंसान को बे-पर समझना

बहुत नुक़्सान-देह होगा वो साबित
चमकती रेत को मंज़र समझना

शब-ए-ग़म में सितारों को ऐ 'इबरत'
सुकूँ-परवर नहीं अख़गर समझना