उर्दू शायरी · ग़ज़ल

meri palkon ki dahliz par is tarah mere ashkon na tum jagmagate raho

मेरी पलकों की दहलीज़ पर इस तरह मेरे अश्कों न तुम जगमगाते रहो

میری پلکوں کی دہلیز پر اس طرح میرے اشکوں نہ تم جگمگاتے رہو

शायर: Aalam Nizami6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मेरी पलकों की दहलीज़ पर इस तरह मेरे अश्कों न तुम जगमगाते रहो
कैफ़ियत दिल की ज़ाहिर किसी पर न हो ग़म ख़ुशी की झलक में छुपाते रहो

डगमगाने न दो हौसलों के क़दम अपनी हिम्मत का रखना है तुम को भरम
बिजलियाँ आशियाना जलाती रहें तुम नया आशियाना बनाते रहो

कर दें वीराँ न ये अम्न की बस्तियाँ बुग़्ज़-ओ-नफ़रत की ये सर-फिरी आँधियाँ
इन को रखना है तुम को जो औक़ात में तुम चराग़-ए-मोहब्बत जलाते रहो

क्या ख़बर क्या हैं ऐसी भी मजबूरियाँ बढ़ गईं ख़ूनी रिश्तों में भी दूरियाँ
दोस्तो ये तक़ाज़ा है हालात का दूरियाँ तुम दिलों की मिटाते रहो

सर कटे या रहे इस का ग़म न करो ज़ुल्म के सामने तुम कहीं न झुको
जो ग़लत है तुम उस की मज़म्मत करो और आवाज़-ए-हक़ भी उठाते रहो

जी लो ख़ुद के लिए कुछ नहीं फ़ाएदा ज़िंदगी का है 'आलम' यही क़ा'एदा
मक़्सद-ए-ज़िंदगी होगा हासिल तुम्हें दूसरों के सदा काम आते रहो