उर्दू शायरी · ग़ज़ल

mere KHwabon ko nigalne ka irada na kare

मेरे ख़्वाबों को निगलने का इरादा न करे

میرے خوابوں کو نگلنے کا ارادہ نہ کرے

शायर: Aalam Nizami6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मेरे ख़्वाबों को निगलने का इरादा न करे
कह दो सूरज से निकलने का इरादा न करे

उस से बढ़ कर कोई मुहताज नहीं हो सकता
गिर के जो शख़्स सँभलने का इरादा न करे

जो हवाओं के मिज़ाजों से नहीं है वाक़िफ़
मेरे हमराह वो चलने का इरादा न करे

गुफ़्तुगू ज़हर-भरी सुन ले जो इंसानों की
साँप भी ज़हर उगलने का इरादा न करे

अपनी क़िस्मत में है मंज़िल तो ख़ुद आ जाएगी
अब जुनूँ राह बदलने का इरादा न करे

निय्यतें साफ़ घटाओं की नहीं हैं 'आलम'
चाँद से कह दो निकलने का इरादा न करे