उर्दू शायरी · ग़ज़ल

maujud jo saqi hai to phir kya nahin milta

मौजूद जो साक़ी है तो फिर क्या नहीं मिलता

موجود جو ساقی ہے تو پھر کیا نہیں ملتا

शायर: Maharaja Sir Kishan Parashad Shad11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मौजूद जो साक़ी है तो फिर क्या नहीं मिलता
हम उस के हैं क्या साग़र-ओ-मीना नहीं मिलता

ये अश्क का क़तरा है मिरे दीदा-ए-तर का
ऐसा तो कभी गौहर-ए-यकता नहीं मिलता

क्या ख़ाक नज़र आए सर-ए-तूर भला अब
इस आँख का अब कोई भी मूसा नहीं मिलता

क्यों छानते हैं ख़ाक बयाबान की आशिक़
मजनूँ की तरह नाक़ा-ए-लैला नहीं मिलता

अपने को अगर है तो ख़ुदा पर है भरोसा
दुनिया में कोई और सहारा नहीं मिलता

मूसा ही रहे हाए न वो तूर है बाक़ी
ऐ आँख कहीं अब वो तजल्ला नहीं मिलता

इस आलम-ए-तकवीं में अयाँ जल्वे हैं लेकिन
अब कोई इन्हें देखने वाला नहीं मिलता

हर ज़र्रे में है नूर चमकता हुआ उस का
लेकिन कोई अब महव-ए-तमाशा नहीं मिलता

निय्यत है अगर ख़ैर तो फिर इस को कमी क्या
इंसान को क्या रुतबा-ए-आली नहीं मिलता

माँगे जो ब-इख़्लास कोई अपने ख़ुदा से
क्या चीज़ नहीं देता वो क्या क्या नहीं मिलता

ऐ 'शाद' अगर दर्द-ए-मोहब्बत नहीं दिल में
ये बात रहे याद मसीहा नहीं मिलता