उर्दू शायरी · ग़ज़ल

masafaten kab guman mein thin safar se aage

मसाफ़तें कब गुमान में थीं सफ़र से आगे

مسافتیں کب گمان میں تھیں سفر سے آگے

शायर: Jaleel 'Aali'6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मसाफ़तें कब गुमान में थीं सफ़र से आगे
निकल गए अपनी धुन में उस के नगर से आगे

शजर से इक उम्र की रिफ़ाक़त के सिलसिले हैं
निगाह अब देखती है बर्ग ओ समर से आगे

ये दिल शब ओ रोज़ उस की गलियों में घूमता है
वो शहर जो बस रहा है दश्त-ए-नज़र से आगे

ख़जिल ख़यालों की भीड़ हैरत से तक रही है
गुज़र गया रह-रव-ए-तमन्ना किधर से आगे

तिलिस्म-ए-अक्स-ओ-सदा से निकले तो दिल ने जाना
ये हर्फ़ कुछ कह रहे हैं अर्ज़-ए-हुनर से आगे

निसार उन साअतों पे सदियों के सहर 'आली'
जिए हैं जिन के जिलो में शाम ओ सहर से आगे