उर्दू शायरी · ग़ज़ल

maqtal se jab guzar ke harifana aaiye

मक़्तल से जब गुज़र के हरीफ़ाना आइए

مقتل سے جب گزر کے حریفانہ آئیے

शायर: Parvin Shere5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मक़्तल से जब गुज़र के हरीफ़ाना आइए
इक दश्त-ए-बे-कनार में फिर घर बनाइए

तारीक हो न पाए कभी दामन-ए-फ़लक
पलकों से ता-ब-सुब्ह सितारे जलाइए

होने न पाए फूलों का मुहताज गुलसिताँ
दिल के हज़ार ज़ख़्म हमेशा खिलाइए

चेहरों को क़ैद से हुए आज़ाद गर कभी
बिखरे हुए वजूद को कैसे बचाइए

साहिल न दे सका है सहारा तो क्या हुआ
गिर्दाब को असीर-ए-सफ़ीना बनाइए