उर्दू शायरी · ग़ज़ल

manzilon ke nishan nahin milte

मंज़िलों के निशाँ नहीं मिलते

منزلوں کے نشاں نہیں ملتے

शायर: Qamar Moradabadi8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मंज़िलों के निशाँ नहीं मिलते
तुम अगर ना-गहाँ नहीं मिलते

आशियाने का रंज कौन करे
चार तिनके कहाँ नहीं मिलते

दास्तानें हज़ार मिलती हैं
साहिब-ए-दास्ताँ नहीं मिलते

यूँ न मिलने के सौ बहाने हैं
मिलने वाले कहाँ नहीं मिलते

इंक़िलाब-ए-जहाँ अरे तौबा
हम जहाँ थे वहाँ नहीं मिलते

दोस्तों की कमी नहीं हमदम
ऐसे दुश्मन कहाँ नहीं मिलते

जिन को मंज़िल सलाम करती थी
आज वो कारवाँ नहीं मिलते

शाख़-ए-गुल पर जो झूमते थे 'क़मर'
आज वो आशियाँ नहीं मिलते