उर्दू शायरी · ग़ज़ल

main waqt ki aabju se aage nikal gaya hun

मैं वक़्त की आबजू से आगे निकल गया हूँ

میں وقت کی آب جو سے آگے نکل گیا ہوں

शायर: Jabbar Wasif10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मैं वक़्त की आबजू से आगे निकल गया हूँ
सो दहर की हा-ओ-हू से आगे निकल गया हूँ

मैं बे-शरीअ'त तहारतों की तलाश में था
मैं बा-शरीअ'त वुज़ू से आगे निकल गया हूँ

तू जानता है कि मेरा विज्दान वज्द में है
तू जानता है मैं तू से आगे निकल गया हूँ

मैं रक़्स करते हुए तहज्जुद की साअ'तों में
इबादतों के ग़ुलू से आगे निकल गया हूँ

न-जाने किस काएनात में पावँ रख दिए हैं
मैं रात-दिन की नुमू से आगे निकल गया हूँ

अबस हैं सब आलम-ए-तहय्युर मिरी नज़र में
मैं आलम-ए-जुस्तुजू से आगे निकल गया हूँ

मैं इस जहान-ए-क़बा-दरीदा का बख़िया-गर था
मगर मैं कार-ए-रफ़ू से आगे निकल गया हूँ

मुझे नई शक्ल की ज़मीं पर है बात करनी
मैं बैज़वी गुफ़्तुगू से आगे निकल गया हूँ

मिरी अजल की भी मौत ईजाद हो गई है
मैं साँस लेते लहू से आगे निकल गया हूँ

मुझे नहीं अपने रख़्त-ए-हस्ती की फ़िक्र 'वासिफ़'
मैं हस्त की आरज़ू से आगे निकल गया हूँ