उर्दू शायरी · ग़ज़ल

main pasban-e-bagh-e-haqiqat se Dar gaya

मैं पासबान-ए-बाग़-ए-हक़ीक़त से डर गया

میں پاسبان باغ حقیقت سے ڈر گیا

शायर: Faisal Fehmi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मैं पासबान-ए-बाग़-ए-हक़ीक़त से डर गया
सो दश्त-ए-दिल की ख़ाक उड़ाने से मर गया

बहता रहा मैं साहिल-ए-दुनिया की रेत पर
आख़िर बदन की ख़ाक समेटी तो घर गया

कुछ तो मिरे सुख़न की हरारत से खिल उठा
कुछ मैं तिरे जमाल के सदक़े सँवर गया

पहले तो ख़ैर दिल में तिरी गर्द-ए-याद थी
पर अब तो वो ग़ुबार भी दिल से उतर गया

आवाज़ दे रहे हैं मुझे वहशियान-ए-शहर
और बैन कर रहे हैं कि 'फ़हमी' किधर गया