उर्दू शायरी · ग़ज़ल

koi jahan mein sahab-e-iman na ban saka

कोई जहाँ में साहब-ए-ईमाँ न बन सका

کوئی جہاں میں صاحب ایماں نہ بن سکا

शायर: Faisal Fehmi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कोई जहाँ में साहब-ए-ईमाँ न बन सका
तुफ़ है कि इश्क़ मज़हब-ए-इंसाँ न बन सका

ता-उम्र तिफ़्ल-ए-दिल पे यतीमी का कर्ब था
कोशिश तो की मगर मैं कभी माँ न बन सका

या'नी जुनूँ के बाब में भी इंतिख़ाब था
जो बहर बन गया वो बयाबाँ न बन सका

शहर-ए-ख़िरद के बाब हक़ीक़त का हर ख़याल
दश्त-ए-गुमाँ की राह का इम्काँ न बन सका

ये ख़ार-ज़ार सब का गुलिस्ताँ तो बन गया
ये ख़ार-ज़ार मेरा गुलिस्ताँ न बन सका