उर्दू शायरी · ग़ज़ल

maine to kabhi usko musalsal nahin dekha

मैं ने तो कभी उस को मुसलसल नहीं देखा

میں نے تو کبھی اس کو مسلسل نہیں دیکھا

शायर: Habib Rehman5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मैं ने तो कभी उस को मुसलसल नहीं देखा
चेहरा भी कभी उस का मुकम्मल नहीं देखा

आँखों के नशे से मुझे फ़ुर्सत ही नहीं थी
बस इस लिए मैं ने कभी काजल नहीं देखा

मज़दूर गिरफ़्तार है फ़ाक़ों के जहाँ में
ऐसों ने कभी सब्र का वो फल नहीं देखा

वाजिब थी मिरी राह-ए-मोहब्बत में वो ठोकर
मैं ने कभी रस्ते में जो सिगनल नहीं देखा

यार-ए-दिल-ए-'रहमान' जुनूँ से डरा है बस
उस ने यहाँ मुझ सा कोई पागल नहीं देखा