उर्दू शायरी · ग़ज़ल

maghrur mohabbat ki jaza ras na aai

मग़रूर मोहब्बत की जज़ा रास न आई

مغرور محبت کی جزا راس نہ آئی

शायर: Habib Rehman5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मग़रूर मोहब्बत की जज़ा रास न आई
चाही थी जो हम ने वो वफ़ा रास न आई

हम ने तो हर इक हुक्म पे लब्बैक कहा था
फिर भी उसे तस्लीम-ओ-रज़ा रास न आई

रुख़ मोड़ लिया ज़ख़्म की 'आदत को लगा कर
मुझ को ये जुदाई भी ज़रा रास न आई

जाना था मुझे तेरी मोहब्बत से परे यूँ
देखा तो मुझे ख़ुद की दशा रास न आई

क्यों 'इश्क़ की 'रहमान' ने ये राह चुनी थी
फिर उस को दवा हो या दु'आ रास न आई