उर्दू शायरी · ग़ज़ल

kuchh bhi mila na mujhko ye sab falah kar ke

कुछ भी मिला न मुझ को ये सब फ़लाह कर के

کچھ بھی ملا نہ مجھ کو یہ سب فلاح کر کے

शायर: Habib Rehman5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

कुछ भी मिला न मुझ को ये सब फ़लाह कर के
अब देखना है मुझ को ये दिल तबाह कर के

होता नहीं मयस्सर मैं इक जगह कहीं पर
तू दे जगह मुझे अब ये दिल पनाह कर के

अब देख कर जो उस को दुनिया ये जल रही है
दिखला रहा हूँ उस को मैं रश्क-ए-माह कर के

वो हुस्न पर तकब्बुर आ ही गया उसे फिर
इज़हार-ए-'इश्क़ मुकरा जो वाह वाह कर के

रोती रही मोहब्बत मेरी सदा बिछड़ कर
पछता रहा हूँ मैं अब ऐसा गुनाह कर के