उर्दू शायरी · ग़ज़ल

maine ek aawaz suni thi kamre mein KHamoshi ki

मैं ने इक आवाज़ सुनी थी कमरे में ख़ामोशी की

میں نے اک آواز سنی تھی کمرے میں خاموشی کی

शायर: Yasir Raza Asif7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मैं ने इक आवाज़ सुनी थी कमरे में ख़ामोशी की
मेरे कान में आ कर तेरी यादों ने सरगोशी की

कुछ तो घर का रस्ता मैं भी अपनी धुन में भूल गया
और नशीली आँखों ने भी तारी कुछ मद-होशी की

हम ने फूलों से मिसरों को ख़ून-ए-दिल से यूँ सींचा
सारी उम्र ही ख़ुशबू बाँटी हम ने इत्र-फ़रोशी की

अपनों ने राज़ों की गठड़ी बीच चौराहे में रख दी
लोगों ने तो बात उछाली रब ने पर्दा-पोशी की

कितने ही अन-देखे मंज़र मुझ से बातें करते हैं
जब भी ग़ज़लें पढ़ता हूँ मैं 'साग़र' 'मोहसिन' 'दोषी' की

हम ने सोचा और धुएँ ने ख़द्द-ओ-ख़ाल बना डाले
हम ने तेरा हिज्र मनाया खुल कर सिगरेट-नोशी की

ख़्वाबों की दुनिया से 'आसिफ़' अब तो बाहर आ जाओ
तपता सूरज सर पर है और बातें राका-पोशी की