उर्दू शायरी · ग़ज़ल

maine dekha hai kaisa ye sapna naya raat ke is pahar

मैं ने देखा है कैसा ये सपना नया रात के इस पहर

میں نے دیکھا ہے کیسا یہ سپنا نیا رات کے اس پہر

शायर: Sabihuddin Shoaiby6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मैं ने देखा है कैसा ये सपना नया रात के इस पहर
मुझ से बिछड़ा हुआ कोई अपना मिला रात के इस पहर

नींद क्यों उड़ गई चैन क्यों खो गया रात के इस पहर
ये अचानक मिरे साथ क्या हो गया रात के इस पहर

यूँ लगा मुझ को जैसे फ़ज़ा ख़ुश्बूओं से महकने लगी
फिर किसी की गली से चली है हवा रात के इस पहर

दिल में जागी है कैसी तमन्ना नई ख़ुद मैं हैरान हूँ
इक नई आरज़ू ने मुझे छू लिया रात के इस पहर

उस की बिखरी हुई लट ने उलझाए रक्खा मुझे और मैं
चाहता था हटा दूँ न मुमकिन हुआ रात के इस पहर

और क्या कीजिएगा 'सबीह' उस की अब आप मंज़र-कशी
पल जो आया और आ कर चला भी गया रात के इस पहर