उर्दू शायरी · ग़ज़ल

main jhuTa hun mujhse hi har jurm hua hai

मैं झूठा हूँ मुझ से ही हर जुर्म हुआ है

میں جھوٹا ہوں مجھ سے ہی ہر جرم ہوا ہے

शायर: Jaleel 'Aali'7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

मैं झूठा हूँ मुझ से ही हर जुर्म हुआ है
तू सच्चा है तू जो चाहे कह सकता है

गाँव के चौपालों में सहमे सहमे चेहरे
शहर के बाज़ारों में कैसा हंगामा है

पंछी हर सू चीख़म धाड़ मचाते उभरे
फ़ायर की आवाज़ से जंगल जाग उठा है

मैं तो सदियों की मेहनत से हाँप रहा हूँ
तू क्यूँ चुप है तेरा चेहरा क्यूँ उतरा है

हम भी एक ज़माने में बद-नाम थे लेकिन
छोड़ो यारो इन बातों से क्या होता है

लोग ज़मीं पर जो जी चाहे करते जाएँ
अल्लह ऊपर बैठा सब कुछ देख रहा है

शब सोएँ तो काश क़यामत आ ही जाए
मुझ पे ख़ुदा की मार ये मैं ने क्या सोचा है